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\"जीवन का क्या महत्व क्या है\"

जब मैं पूरे ब्रह्माण्ड को आपस में जुड़ा हुआ पाता हूं, तो सोचता हूं कि इस में मनुष्य का क्या कोई उपयोगी महत्व है, और क्या हम जब तक यहां हैं, क्या हमारे अस्तित्व से दूसरों को कोई लाभ है भी?

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2888 days 21 hrs 32 mins ago By Waste Sam
 

radhey radhey, jeevan jisne dharan kiya hai woh hai ek jeev jismein bhagwan khud baithe hai, yeh humara roop bhi bhagwan ka hee roop hai jo unke leela ka hissa hai isliye iss jeevan ka mahtav hai... hum doosaro ke jeevan mein tab mahtavpoorna ho sakte hai jab hum ek acche insaan bane aur sab ka accha karne ke hee kamana ho mann mein.. jai shri radhey

2900 days 4 hrs 9 mins ago By Gulshan Piplani
 

मैं अंतिम से उपर वाली लाइन मैं थोडा संशोधन कर रहा हूँ, ध्यान दें: अर्थात हर अंश में वोह सब गुण व्याप्त हैं जो अंशी में व्याप्त हैं

2900 days 4 hrs 17 mins ago By Gulshan Piplani
 

मैं अंतिम से उपर वाली लाइन मैं थोडा संशोधन कर रहा हूँ, ध्यान दें: अर्थात हर अंश में वोह सब गुण व्याप्त हैं जो अंशी में व्याप्त हैं

2900 days 4 hrs 18 mins ago By Gulshan Piplani
 

मैं अंतिम से उपर वाली लाइन मैं थोडा संशोधन कर रहा हूँ, ध्यान दें: अर्थात हर अंश में वोह सब गुण व्याप्त हैं जो अंशी में व्याप्त हैं

2900 days 4 hrs 22 mins ago By Gulshan Piplani
 

दरअसल आपने एक साथ दो प्रशन पूछें हैं| १)जुड़े हुए ब्रह्माण्ड में मनुष्य की उपयोगिता क्या है? २) हमारे अस्तित्व की उपयोगिता? यहाँ में दुबारा एक बात को प्रस्तुत करता हूँ|आकाश वायु को जन्म देता है|वायु अग्नि को जन्म देती है|अग्नि जल को जन्म देती है|जल पृथ्वी को जन्म देता है|पृथ्वी प्रकृति को जन्म देती है| प्रकृति जीव को शरीर प्राप्त करवाती है अर्थात पांचो तत्वों से मिल कर आप के जीव को शरीर प्राप्त हुआ| तो अगर सोचें तो इन सब की उपयोगिता आप को अर्थात जीव को शरीर प्रदान करने हेतु ही प्रभु ने संचालित की| इतने तत्वों का निर्माण करने के पश्चात् आप को शरीर प्राप्त हुआ अर्थात इन पाँचों तत्वों के बिना न मनुष्य उत्पन्न हो सकता है न जी सकता है तो अब आपको मनुष्य की उपयोगिता और महत्त्व समझ में आना चाहिए| प्रभु ने यह पञ्च तत्व जीव को शरीर प्राप्त करवाने के लिए कितना प्रयास किया| और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में मनुष्य को सबसे अधिक उपयोगी वस्तु प्रदान की जो बुद्धि है| पुराणों में बताया गया है की प्रभु अर्थात अंशी और जीवात्मा अंश है जब वोह मनुष्य का जीवन प्राप्त कर लेती है तो उसको वोह सब शक्तियां मिल जातीं हैं जो देवताओं के पास होती हैं| ब्रह्मसूत्र में बताया गया है कि देवताओं के पद वोही रहते हैं पर अंश बदल जाते हैं| मैं यहाँ अंशी अर्थात मनुष्य की उपयोगिता को विस्तार देना चाहूँगा: आप ने शीशा देखा होगा| मान लें की शीशा अंशी अर्थात प्रभु हैं अगर शीशे के अति सूक्ष्म अंश बना दिए जायें तो प्रत्येक अंश शीशा ही होगा| परन्तु आप उसे पहचान नहीं सकेंगे| परन्तु अगर अंश में एक भी गुण शीशे से अलग हुआ तो वह शीशा नहीं बन सकता| अर्थात हर अंशी में वोह सब गुण व्याप्त हैं जो अंश में व्याप्त हैं| तो इससे मनुष्य की उपयोगिता प्रतिपादित होती है| दूसरी उपयोगिता समझाने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती वोह आपको अपने चिंतन से समझनी चाहिए| - गुलशन हरभगवान पिपलानी

2972 days 1 hrs 59 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... जीवन का महत्व मृत्यु के लिये होता है। लाभ-हानि की चिंता से मुक्त हुआ व्यक्ति ही मृत्यु को जान पाता है।

2979 days 8 hrs 17 mins ago By Aditya Bansal
 

jai jai shree radhey

2979 days 8 hrs 17 mins ago By Aditya Bansal
 

jai jai shree radhey

2979 days 8 hrs 20 mins ago By Aditya Bansal
 

shyad osko jaddo aye....dekhe or diwana kerde..... dil per kaise kabo paye....... shyad osko jado aye,,,, have nic day to u dear jai shree radhey radhey..

2979 days 8 hrs 40 mins ago By Pradeep Narula
 

श्री श्री रवि शंकर : बहुत अच्छा प्रश्न है! जीवन का क्या महत्व क्या है और हम यहां किसलिये हैं? तुम्हें खुद को शाबासी देनी चाहिये। अगर ये प्रश्न तुम्हारे जीवन में आया है, तो इसका अर्थ है कि तुम्हारी बुद्धि प्रौढ़ है। यहां लाखों लोग बिना ये प्रश्न पूछे कि, ‘जीवन का ध्येय क्या है? मैं यहां क्यों आया हूं?’ अपना पूरा जीवन बिता देते हैं। वे बस भोजन करते हैं, पीते हैं, टेलिविज़न देखते हैं, प्रेम या लड़ाई करते है और मर जाते हैं। उन्हें इस बारे में ज़रा भी ख़्याल नहीं आता। वे एक मिनट भी रुक कर ये नहीं सोचते कि, ‘जीवन क्या है? मैं कौन हूं? मुझे क्या चाहिये? मैं क्या कर सकता हूं? मैं कैसे उपयोगी हो सकता हूं?’ इन में से कोई भी प्रश्न उनके मन में नहीं आते। अगर ये प्रश्न तुम्हारे भीतर आया है तो इसका अर्थ है कि तुमने जीवन जीना शुरु कर दिया है। तुम्हारी जीवन यात्रा सही रास्ते पर जा रही है। इस यात्रा को आध्यात्म कहते हैं – ये जानना कि, ‘इस जीवन का ध्येय क्या है। मुझे क्या चाहिये? जीवन क्या है? मैं कौन हूं?’ इससे पहले कि तुम अपने आप से ये प्रश्न करो कि, ‘मुझे क्या चाहिये?’ तुम्हें ये जानना चाहिये कि तुम कौन हो। जीवन क्या है? इस प्रश्न के दो महत्वपूर्ण भाग हैं – एक विज्ञान है और एक आध्यात्म है। विज्ञान से तुम ये जान पाते हो कि, ‘ये क्या है।’ आध्यात्म से तुम ये जान पाते हो कि, ‘मैं क्या हूं।’ ‘मैं’ और ‘ये’। ‘ये’ की समझ तुम्हें विज्ञान से आती है। ‘मैं’ की समझ तुम्हें आध्यात्म से आती है। ये ‘मैं’ क्या है? ‘मैं’ को जानने के लिये पहले ‘ये’ को जानो। ‘ये क्या है?’ ‘ओह! ये संसार है।’ ‘ये शरीर है।’ और, ‘ये शरीर कैसे आया?’ ‘ये शरीर एक ४-५ किलो के बच्चे के रूप में आया। फिर उस बच्चे ने इस धरती से ही सब सामग्री ली और अब ५० किलो का हो गया है। तो, इस शरीर में क्या है? ये शरीर कैसे बना है? राधे राधे

2980 days 2 hrs 43 mins ago By Pradeep Narula
 

राधे राधे

2980 days 9 hrs 38 mins ago By Jaswinder Jassi
 

प्रकीर्ति ने जीवों की रचना अपनी प्रकीर्ति को चलाने के लिए की है न के किस्सी धर्मकर्म के कारेओ के लिए जीव(मानुष) पैदा किये हैं ] प्रकिरती के नौ मूल स्रोत हैं (सूरज, चाँद ,तारे, मिटी ,अग्नि ,पानी, वायु{हवा }, जी{मनं }, और आकाश{आवाज़ } मिटी-अग्नि - पानी वायु और आकाश के मुख स्रोत से कण निकल कर आपस में जुर्ते हैं और एक बॉडी (सरीर) की रचना होती है ] जे रचना जब से प्रकीर्ति होन्द में आई तब्ब से लगातार हो रही है ] जिस के कारण मुख स्रोतों में कम्मी आना लाजमी है अगर प्रकीर्ति उस कमी को पूरा नही करेगी तो एक सम्मे ऐसा आयेगा जब प्रकीर्ति में बॉडी ही बॉडी होंगी ] इस लिए प्रकीर्ति ने बॉडी( तन्न ) के साथ मनं लग्गा कर जीवों की रचना कर दी , जीव क्या करते हैं ,सबबी प्रकार के जीव वस्तू (बॉडी/तन्न ) खुराक के रूप अपने सरीर के अंदर ले जाते हैं जीवों के सरीर के अंदर रर्सैनिक किर्या होती है जिस से वस्तु अपने मूल तत्व में टूट जाती है ,मल के रूप में जीव उस को सृष्टी बखेर देता है जो अपने मूल तत्व (पानी पानी में हवा हवा में मिटी मिटी में अग्नि अग्नि में और आकाश आकाश में मिल कर उन स्रोतों आई कम्मी को पूरा कर देते हैं ] मानुष का तिआगा मल पशु खा जाते हैं , पशुओं का तिआगा मल पक्षी खा जाते हैं और पक्षिओं की बीठ बनस्पति खाती है ]ये किर्या चारोँ प्रकार के जीव मिल कर लगातार करते रहते हैं ] प्रकीर्ति ने जीवों की रचना केवल इस्सी लिए की हुई है , ये धर्म कर्म पाप पुन स्वर्ग नरक मानुष की अपनी रचना है और कुश नही ] अब्ब विचारण की बात ये है के जीव निर्जीव की रचना में परमात्मा का रोल है ] किओके परमात्मा कोई वस्तु नही केवल ख़ाली स्थान जो के हर समय हर जगह मजूद रहता है , इस को कोई वस्तु नही कहा जा सकता मगर सभी वस्तुए इस के कारण इस के भीतर से ही दिखाई देती एक कण से ले कर ग्रेह तक इस के घेरे में हैं ] सबी इस में ही चल रहे हैं ] ये वस्तु से पहले बी होता है , वस्तू नज़र आते सम्मे ये वस्तु के चोगिर्द रहता है और जब वस्तु नही होती ये फिर बी व्ही पर होता है ] ये कही से नही आता और न ही कही जाता ] जीव निर्जीव वस्तुओं के कण इस में चल कर ही आपस में jur कर पंज तत्व वस्तुओं की रचना करते हैं ] सारी प्रकीर्ति सभी वस्तुए इस में टिकी हुई हैं और चल रही हैं >>>>>>>>>

 
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